नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ बताते हुए उनके घरेलू श्रम की कीमत कम से कम 30,000 रुपये महीना तय की। लेकिन, क्या अदालती फाइलों की यह काल्पनिक आय महिलाओं के वास्तविक जीवन में बराबरी ला पाएगी? इस मुद्दे पर राजनीतिज्ञ और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को आवाज देने वाली सुभाषिनी अली से नाइश हसन ने बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश :
सुप्रीम कोर्ट का गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता कहना कितना बड़ा वैचारिक बदलाव है ?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक सीमित संदर्भ में लिया गया था कि दुर्घटना में मृत महिला को किस प्रकार का मुआवजा दिया जाए। अदालत ने माना कि अगर महिला नौकरी नहीं भी करती है, तो उसके द्वारा किए जाने वाले निःशुल्क श्रम का ध्यान रखना आवश्यक है। यह स्वागत योग्य फैसला है, लेकिन महिलाओं के श्रम और आर्थिक योगदान को पूरी तरह से समझने के लिए नाकाफी है।










































