मॉस्को: अमेरिका-इजरायल के ईरान पर 28 फरवरी को किए गए हमलों के बाद शुरू हुए संघर्ष का सीधा असर समुद्री यातायात पर पड़ा है। खाड़ी देशों से होने वाली एनर्जी सप्लाई में रुकावट ने दुनिया के बड़े हिस्से, खासतौर से एशिया में उर्जा संकट पैदा किया है। इसने रूस को अपने तेल के लिए नए खरीदार तलाशने का अवसर दिया है। एक्सपर्ट को लगता है कि यह रूस के लिए एशिया में प्रभाव मजबूत करने का मौका बन सकता है। यह डोनाल्ड ट्रंप के लिए चिंता का सबब बन सकता है।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, साउथ-ईस्ट एशिया के आसियान देशों की सरकारें होर्मुज स्ट्रेट संकट से हुई फ्यूल की कमी को पूरा करने के लिए रूसी तेल और गैस की ओर रुख कर रही हैं। एनालिस्ट का कहना है कि रूसी फ्यूल के लिए होड़ एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। सवाल यह है कि क्या मॉस्को इमरजेंसी एनर्जी सप्लायर के तौर पर अपनी शॉर्ट-टर्म भूमिका को वहां लंबे समय तक असर में बदल सकता है।
रूस बढ़ाएगा प्रभाव!
एसोसिएशन ऑफ साउथ-ईस्ट एशियन (आसियान) देशों ने घरेलू रिजर्व को मजबूत करने के लिए रूस से फ्यूल सप्लाई की है। इसके लिए उन्होंने रूसी तेल ट्रांजैक्शन के लिए अमेरिका की कुछ समय की पाबंदियों में छूट का इस्तेमाल किया है। हालांकि यूक्रेन में अपनी लड़ाई को लेकर रूस लगातार पश्चिमी देशों की पाबंदियों में बना हुआ है।
मनीला के थिंक टैंक इंटरनेशनल डेवलपमेंट एंड सिक्योरिटी कोऑपरेशन के प्रेसिडेंट चेस्टर कैबल्जा का कहना है कि मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलीपींस और म्यांमार सहित आसियान सदस्यों के रूसी तेल की मांग करने से सप्लाई चेन को मजबूत बनाने के लिए क्षेत्रीय गठबंधनों को नया आकार मिल सकता है।










































