श्रीमद्भगवद्गीता का तेरहवां अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण भगवान ने बतलाया है कि यह शरीर क्षेत्र चौबीस तत्वों से बना है और इसको जानने वाला क्षेत्रज्ञ मैं ही हूं। भगवान ने संक्षेप में यह भी बताया है कि, ज्ञान का सार क्या है, परब्रह्म क्या है और प्रकृति तथा पुरुष का क्या संबंध है।
चौदहवां अध्याय – गुणत्रय विभाग योग, इस अध्याय में भगवान ने बताया है कि प्रकृति और पुरुष के संगम से सब प्राणी पैदा होते हैं। प्रकृति के सत्व, रजस और तमस ये तीन गुण हैं। इन्हीं गुणों के कारण अव्यय जीव शरीर के अधीन हो जाता है। जब मनुष्य इन तीनों गुणों से परे हो जाता है, तब वह मुक्त हो जाता है, उसका आवागमन छूट जाता है।
पंद्रहवां अध्याय – पुरुषोत्तम योग, इस अध्याय में यह बतलाया गया है कि संसार कैसा है, आत्मा का स्वरूप क्या है, संसार से छुटकारा और आत्मज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है।













































