Wildfire In India: उत्तर भारत के पहाड़ों में इन दिनों सिर्फ गर्मी ही नहीं, बल्कि आग भी कहर बनकर फैल रही है। जंगलों में लगी भीषण आग ने हरियाली को राख में बदलना शुरू कर दिया है और दूर-दूर तक धुएं का गुबार आसमान को ढक रहा है। बढ़ते तापमान, सूखी वनस्पति और तेज हवाओं ने हालात को और खतरनाक बना दिया है, जिससे न सिर्फ पर्यावरण बल्कि वन्यजीव और स्थानीय आबादी भी गंभीर संकट में घिरती जा रही है।
फरवरी से लेकर अब तक सिर्फ उत्तराखंड में ही आग लगने की 700 छोटी-बड़ी घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। वहीं, पिछले छह दिनों में प्रदेश में 41.27 हेक्टेयर जंगल जल गए हैं। 19 अप्रैल से 23 अप्रैल के बीच के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश में जंगल की आग में एकाएक बढ़ोतरी देखी गई है।
उत्तराखंड में कहां-कहां लगी आग?
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इन पांच दिनों में प्रदेश में 66 जगहों पर वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें गढ़वाल में 48 और कुमाऊं में 13 स्थानों पर जंगल प्रभावित हुए। बेरीनाग, गंगोलीहाट, गणाई, थल, डीडीहाट, मुनस्यारी, धारचूला सहित बागेश्वर जनपद के धरमघर, कपकोट, कांडा और गरुड़ क्षेत्र के जंगलों में इन दिनों भीषण आग लगी है।
इतना ही नहीं, रुद्रप्रयाग के वन विभाग ने इस मौसम में अब तक जिले भर में जंगल में आग लगने की 20 घटनाएं दर्ज की हैं, जिसकी वजह से वन क्षेत्रों, वन पंचायतों और राजस्व क्षेत्रों में लगभग 15 हेक्टेयर भूमि बुरी तरह प्रभावित हुई है। आग की यह लपटें सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं हैं; मध्य प्रदेश के रीवा स्थित गोविंदगढ़ क्षेत्र की छुहिया घाटी और विंध्य पर्वत श्रृंखला में लगी भीषण आग ने भी विकराल रूप ले लिया है।
कई जगहों पर आग जानबूझकर लगाई गई
रुद्रप्रयाग के संभागीय वन अधिकारियों ने आग की इन घटनाओं के पीछे लंबे समय तक चले सूखे मौसम और मानवीय लापरवाही को मुख्य वजह बताया है। अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया कि कई जगहों पर आग जानबूझकर लगाई गई लगती है।
रुद्रप्रयाग के डीएफओ (DFO) रजत सुमन ने कहा कि कई असामाजिक तत्वों द्वारा जानबूझकर आग लगाई जा रही है, जिससे घटनाओं में वृद्धि हो रही है। कुछ मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार भी किया गया है और आगे की जांच जारी है। अपराधियों को आर्थिक दंड के साथ-साथ गंभीर मामलों में दो साल तक की कैद का सामना करना पड़ सकता है। भारतीय वन अधिनियम के तहत भी इसमें छह महीने की जेल का स्पष्ट प्रावधान है।
पहाड़ी इलाकों में चीड़ (पाइन) के पेड़ अधिक तादाद में पाए जाते हैं, जिनकी सूखी सुइयां (पत्तियां) जमीन पर जमा होकर बारूद की तरह काम करती हैं। ये पत्तियां बेहद जल्दी आग पकड़ती हैं और तेज हवाओं के साथ ढलानदार भू-भाग पर आग को नीचे से ऊपर की ओर तेजी से फैलाती हैं, जिससे इसे काबू करना लगभग नामुमकिन हो जाता है।खतरों से खेलते हैं वनकर्मी
अंततः, जंगलों को बचाने के लिए जनभागीदारी सबसे अहम है, क्योंकि वनकर्मी अक्सर बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के अपनी जान जोखिम में डालकर इन दुर्गम पहाड़ियों पर आग बुझाने का काम करते हैं। प्रकृति के संरक्षण को अक्सर लोग केवल सरकार का काम समझ लेते हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए वन क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए सामूहिक जागरूकता और स्थानीय सहयोग की तत्काल आवश्यकता है।










































