स्कूल के लिए 12 किमी जंगल का रास्ता, डर के मारे एक भी आदिवासी बेटी ने नहीं लिया 9वीं में एडमिशन, बुरहानपुर में व्यवस्था शर्मसार

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बुरहानपुर: जिले के नेपानगर विधानसभा क्षेत्र से सरकारी दावों की पोल खोलती एक दर्दनाक तस्वीर सामने आई है। जहां एक तरफ सरकार हर साल ‘स्कूल चलें हम’ का नारा बुलंद करती है, वहीं आदिवासी बाहुल्य ग्राम बाकड़ी में यह नारा दम तोड़ रहा है।

गांव में हाईस्कूल की सुविधा न होने के कारण यहां की बेटियां आठवीं कक्षा के बाद आगे की पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं। नतीजा यह है कि पिछले पांच सालों में सैकड़ों आदिवासी बेटियां शिक्षा के अधिकार से वंचित हो गईं और कई की कम उम्र में शादी कर दी गई।

आंकड़े दे रहे गवाही, शून्य पर सिमटी संख्या

शिक्षा विभाग की उदासीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल बाकड़ी स्कूल से आठवीं पास करने वाले 34 बच्चों में से केवल 8 लड़कों ने ही आगे की पढ़ाई के लिए नौवीं में प्रवेश लिया है। दूसरी ओर, गांव की एक भी बेटी आगे पढ़ने नहीं जा सकी।

जंगल का रास्ता और सुरक्षा का डर

बाकड़ी गांव से नजदीकी हाईस्कूल करीब 12 किलोमीटर दूर है, जिसका रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। आदिवासी पालकों का कहना है कि सुनसान और जंगली रास्ते से बेटियों को इतनी दूर भेजना सुरक्षित नहीं है, इसलिए वे चाहकर भी उन्हें आगे नहीं पढ़ा पाते। प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही का आलम यह है कि प्रस्ताव सिर्फ फाइलों में घूम रहे हैं।

फाइलों में अटका बेटियों का भविष्य

ग्रामीणों का आरोप है कि वे वर्षों से गांव में हाईस्कूल की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिलता है। अब देखना होगा कि मीडिया में मामला आने के बाद नींद से जागा शिक्षा विभाग कब तक यहां स्कूल शुरू करा पाता है।

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