बालाघाट की सर्वाधिक प्रभावित पंचायत अडोरी, जहां आठ बैगा बच्चों की मौत, वहां सिर्फ एक एएनएम

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बालाघाट। बिरसा विकासखंड के बैगा अंचल में फैली बीमारी ने कई मासूमों की जिंदगी छीन ली है। सबसे ज्यादा प्रभावित पंचायत है अडोरी। इस पंचायत के बोंदारी गांव में ही जुलाई से अब तक आठ बच्चों की मौत हो चुकी है, लेकिन 637 की आबादी वाले इस गांव में मात्र एक एएनएम है।

दवा छिड़काव जैसे अहम कार्यक्रमों को बुरी तरह प्रभावित

बोंदारी ही नहीं, अन्य दो पंचायत (मछुरदा व दूल्हापुर) के भी लगभग 8-10 गांवों और टोलों की जिम्मेदारी संभाल रही है। बैगा क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी ने यहां टीकाकरण, मच्छरदानी वितरण, दवा छिड़काव जैसे अहम कार्यक्रमों को बुरी तरह प्रभावित कर रखा है।

मासूमों को खोने वाले पीड़ित परिवार ने कही बीती

बोंदारी में बीमारी से मरने वाले आठ बच्चों में से तीन बच्चों की मौत सरकारी फाइल में दर्ज हुई है। इसी पंचायत के ग्राम कुंडेकसा में दो बच्चों को भी बीमार लील चुकी है, लेकिन इनमें एक ही बच्चा सरकारी आंकड़ों में दर्ज है। ‘नईदुनिया’ ने इन गांवों में पहुंचकर मासूमों को खोने वाले पीड़ित परिवार से बातचीत की।अकाल और अव्यवस्थाओं की दुखभरी कहानी बताई

स्वजनों ने उनके गांवों में सुविधाओं के अकाल और अव्यवस्थाओं की दुखभरी कहानी बताई। सबसे ज्यादा पीड़ा, वो परिवार झेल रहे हैं, जिनके आंगन से उनके मासूमों की अर्थी उठी थी। प्रशासन ने ऐसे परिवारों को 20 हजार रुपये की मुआवजा राशि देकर उनके साथ मजाक किया है।

मैं जब छोटा था, तब हुआ था दवा का छिड़काव

बोंदारी के चैनसिंह मरकाम (33) के इकलौते बेटे सचिन (5) ने एक अगस्त को आखिरी सांस ली थी। चैनसिंह ने बताया- सचिन 25 जुलाई को बीमार पड़ा। जिला अस्पताल में कुछ दिन इलाज चला, फिर हम उसे गोंदिया के निजी अस्पताल ले गए। दो दिन में हमें 70 हजार रुपये खर्च करने पड़े। यहां-वहां से कर्ज लिया, लेकिन डाक्टरों ने भी जवाब दे दिया। घर लाते ही उसकी मौत हो गई। मुआवजे के रूप में हमें सिर्फ 20 हजार रुपये मिले हैं।

गांव में आखिरी बार कब मच्छरदानी बंटी थी, याद नहीं

चैनसिंह ने बताया कि जब मैं कक्षा तीसरी में था, तब गांव में दवा का छिड़काव करते देखा था। उसके बाद आज तक अमले ने कभी गांव आकर दवा नहीं छिड़की। गांव में आखिरी बार कब मच्छरदानी बंटी थी, याद नहीं है। सचिन 10-11 माह का था, तब उसे टीका लगा था। उसके बाद टीकाकरण टीम गांव नहीं आई।

बेटी की मौत रिकार्ड में नहीं, पंचायत से मिले पांच हजार

बाेंदारी की एक साल 9 माह की पूजा धुर्वे भी महामारी का शिकार होकर 26 जुलाई को जान गंवा चुकी है। पूजा के पिता चमरू धुर्वे ने बताया कि पूजा की मौत सरकारी फाइलों में दर्ज ही नहीं है। अडोरी पंचायत के सरपंच परशराम धुर्वे ने पांच हजार रुपये की आर्थिक सहायता की थी।

मौत के बाद विभाग के अधिकारी-कर्मचारी इन गांवों में पहुंच रहे

चमरू बताते हैं कि महामारी फैलने और बच्चों की मौत के आंकड़े बढ़ने के बाद ही स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग सहित अन्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारी इन गांवों में पहुंच रहे हैं। इससे पहले कोई सरकारी महकमा गांव नहीं आता था। हैंडपंप की सफाई और क्लोरिनेशन का काम अब जाकर हो रहा है। ठप पड़ी नल-जल योजना के कारण उन्हें आज भी झिरिया का ही पानी पीना पड़ रहा है।

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