भारत में करीब 3,000 साल गन्ने से चीनी बनाने का तरीका ईजाद किया गया। इसके बाद यह फारस की खाड़ी से होते हुए ईरान, चीन और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों में पहुंची। धर्मयुद्धों के दौरान यूरोपीयों का एक बड़ा संपर्क भारत की चीनी से हुआ। यह तब हुआ जब कई पश्चिमी यूरोपीय देशों के योद्धा पवित्र भूमि (होली लैंड) गए। अपनी मुहिम खत्म होने के बाद वे यूरोप में बहुत महंगा ‘मीठा नमक’ लेकर आए, जिसने कई शासकों और अमीर नागरिकों की दिलचस्पी बढ़ाई। उस वक्त यूरोप में चीनी को मीठा नमक ही कहा जाता था। भारत से यह चीनी आज की फारस की खाड़ी से होते हुए यूरोप तक पहुंची थी। बाद में दुनिया ने अपना कई तरीका खोज निकाला। यूरोप में मुनाफे और बढ़ती मांग के चलते इस चीनी को ‘सफेद सोना (White Gold) भी कहा जाने लगा था।फारस के राजा के हमले में चीनी गई ईरान
चीनी बनाने की जानकारी पश्चिम में फारस तक और फिर 7वीं सदी AD के बाद पूरे इस्लामिक जगत में फैल गई। मध्यकालीन यूरोप में चीनी सिर्फ व्यापारिक रास्तों से ही पहुंची।
चीनी का सबसे पुराना जिक्र 510 BC का मिलता है, जब उस समय के फारस (Persia) के सम्राट डेरियस प्रथम ने भारत पर हमला किया था। वहां उन्हें ‘वह नरकट (reed) मिला जो बिना मधुमक्खियों के शहद देता है।’










































