हमारी धरती का पर्यावरण लगातार बदतर हो जा रहा है और इसके लिए इंसान खुद जिम्मेदार है। धरती के इतिहास में अभी तक 5 बार सामूहिक विनाश की स्थिति निर्मित हुई है और पांच बार सामूहिक विनाश की स्थिति प्राकृतिक कारणों से बनी थी, लेकिन हाल ही में हुए एक शोध में दावा किया गया है कि धरती एक बार फिर सामूहिक विनाश की ओर बढ़ रही है और रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस बार धरती का सामूहिक विनाश प्राकृतिक कारणों से नहीं बल्कि मानवीय गतिविधियों के कारण हो होगा। जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल रिव्यू में वैज्ञानिकों ने लिखा है कि बीते 500 वर्षों में धरती पर लगभग 13 प्रतिशत अकशेरुकी प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसे ही यह प्रक्रिया जारी रही तो जल्द ही जैव विविधता में भयानक स्तर पर गिरावट आएगी।
अकशेरुकी प्रजातियों पर रखना होगी नजरवैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हम अकशेरुकी प्रजातियों के जीवों की लिस्ट देखें तो पता चलेगा कि हम पृथ्वी से बड़े पैमाने पर जीवों की एक बड़ी संख्या को खो रहे हैं। ऐसी प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं। वैज्ञानिकों ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए साल 2015 के एक अध्ययन का हवाला दिया है, जिसमें कहा जा रहा है कि पृथ्वी से मोलस्क को खत्म किया जा रहा है।
घोंघे की 7 फीसदी आबादी 600 साल में खत्म हुईरिसर्च में दावा किया गया है कि धरती पर पाए जाने वाले घोंघे (Snails) की 7 फीसदी आबादी तो बीते 1500 से खत्म हो चुकी है। यह तो जमीन पर रहने वाले एक अकशेरुकी प्रजाति (Invertebrate Species) का जीव है। समुद्र में यह दर बहुत ज्यादा है। जमीन और समुद्र में रहने वाले प्राणियों को मिलाकर देखा जाए तो इस प्रजाति के 7.5 से 13 फीसदी जीव खत्म हो चुके हैं।










































